नए साल की दस्तक होते ही पूरे शहर में पुलिस की नीली-लाल बत्तियां चमकने लगी हैं। जगह-जगह बैरिकेड्स हैं, ब्रेथ एनालाइजर मशीनें धूल झाड़कर बाहर निकाल ली गई हैं और ‘ड्रिंक एंड ड्राइव’ यानी धारा 185 के तहत ताबड़तोड़ कार्रवाई की तैयारी है।

धमतरीं/ “नए साल की दस्तक होते ही पूरे शहर में पुलिस की नीली-लाल बत्तियां चमकने लगी हैं। जगह-जगह बैरिकेड्स हैं, ब्रेथ एनालाइजर मशीनें धूल झाड़कर बाहर निकाल ली गई हैं और ‘ड्रिंक एंड ड्राइव’ यानी धारा 185 के तहत ताबड़तोड़ कार्रवाई की तैयारी है।
लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या शराब पीकर गाड़ी चलाना सिर्फ 31 दिसंबर की रात को ही अपराध है? क्या बाकी के 364 दिन सड़कें इतनी सुरक्षित हो जाती हैं कि पुलिस को चेकिंग की जरूरत ही नहीं पड़ती? आखिर क्यों ऐसा लगता है कि पुलिसिया जिन्न सिर्फ नए साल के जश्न में ही बोतल से बाहर आता है?”
“नियमों का पालन होना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है। शराब पीकर गाड़ी चलाना खुद की और दूसरों की जान जोखिम में डालना है। लेकिन जनता पूछ रही है कि क्या यह सक्रियता केवल इवेंट मैनेजमेंट का हिस्सा है?
शहर के वो डार्क स्पॉट्स, जहाँ साल भर अंधेरा रहता है और अपराधी सक्रिय रहते हैं, वहाँ पुलिस की गश्त क्यों नहीं दिखती? क्यों केवल जश्न के माहौल में ही आम आदमी को कानून का डर दिखाया जाता है? क्या यह सुरक्षा की चिंता है या फिर साल के अंत में आंकड़ों का ग्राफ ऊंचा दिखाने की होड़?”
“कानून का सम्मान तब बढ़ता है जब वह साल भर एक समान दिखे, न कि सिर्फ खास तारीखों पर। अगर पुलिस की यह मुस्तैदी ‘सीजनल’ न होकर ‘सदाबहार’ हो जाए, तो शायद अपराधों का ग्राफ सच में नीचे आए। पुलिस को यह समझना होगा कि सुरक्षा का अहसास रोज होना चाहिए, न कि सिर्फ साल की आखिरी रात को।
