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माफियाओं का नया खेल अब सिंडिकेट बनाकर संचालित होंगी अवैध रेत खदानें।

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दामों में भारी उछाल 100 रुपये वाली रेत की ट्रिप अब 300 रुपये में, आम आदमी की जेब पर डाका।

निर्माण कार्य पर संकट प्रधानमंत्री आवास और निजी घरों के सपनों पर महंगाई की मार।

विधायक पर टिकी नजरें क्या विधायक ओंकार साहू अपने वादे के मुताबिक करेंगे सख्त कार्रवाई?

धमतरीं/अवैध खदानों का बदला स्वरूप सिंडिकेट की मनमानी,सूत्रों के हवाले से एक बड़ी खबर सामने आ रही है कि धमतरी जिले के कोहलीयारी, अमेठी और अन्य क्षेत्रों में सक्रिय रेत माफियाओं ने अब अपना चोला बदल लिया है। प्रशासन की आंखों में धूल झोंकने के लिए इन माफियाओं ने एक ‘सिंडिकेट’ तैयार किया है। इसके तहत अब अलग-अलग गुटों के बजाय सभी माफिया मिलकर एक तय रेट पर अवैध रेत का कारोबार कर रहे हैं।

तीन गुना बढ़े रेट ट्रैक्टर परिवहन बना कमाई का जरिया

रेत के इस अवैध कारोबार में सबसे चौंकाने वाला बदलाव कीमतों में आया है। बताया जा रहा है कि पहले जिस रेत की एक ट्रैक्टर ट्रिप के लिए 100 रुपये लिए जाते थे, सिंडिकेट बनने के बाद उसे बढ़ाकर 300 रुपये कर दिया गया है।

 कीमतों में यह 200% की वृद्धि सीधे तौर पर खनिज संपदा की चोरी के साथ-साथ आम जनता की जेब पर बोझ बढ़ा रही है।

आम जनता के सपनों पर महंगाई का प्रहार

इस सिंडिकेट के चलते बाजार में रेत की किल्लत और ऊंचे दामों की संभावना बढ़ गई है। इसका सबसे बुरा असर प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के लाभार्थियों और अपने जीवन की जमा-पूंजी से घर बना रहे मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ेगा। रेत महंगी होने से निर्माण लागत बढ़ेगी, जिससे कई प्रोजेक्ट्स बीच में ही अटक सकते हैं।

विधायक ओंकार साहू की सक्रियता पर सवाल

गौरतलब है कि पूर्व में विधायक ओंकार साहू ने स्वयं खदानों तक पहुंचकर अवैध रेत परिवहन कर रहे ट्रैक्टरों पर कार्रवाई करने की बात कही थी। उन्होंने खनिज संपदा की चोरी रोकने के लिए कड़े तेवर दिखाए थे। लेकिन अब, जब माफिया सिंडिकेट बनाकर खुलेआम चुनौती दे रहे हैं, तब देखना होगा कि माननीय विधायक इस पर क्या संज्ञान लेते हैं। 

प्रशासन की चुप्पी या कड़ी कार्रवाई?

बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन और खनिज विभाग को इस संगठित सिंडिकेट की भनक नहीं है? या फिर माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि उन्हें कानून का कोई डर नहीं रहा। अब जनता की नजरें जिले के आला अधिकारियों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर टिकी हैं कि वे इस ‘रेत के खेल’ को कब खत्म करते हैं।

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