- जनहित का नकाब या वसूली का खेल? रात के अंधेरे में हाइवा रोककर ‘पीट पास’ मांगने की इनसाइड स्टोरी!

सवाल सीधा है और बहुत कड़वा है। आए दिन रात के अंधेरे में 5 से 7 लड़के हाइवा गाड़ियों के सामने खड़े हो जाते हैं। गाड़ियों को जबरन रोका जाता है, चालकों से सवाल-जवाब होते हैं, और ‘पीट पास’ (Pit Pass) मांगा जाता है। लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही इशारा कर रही है। सूत्रों की मानें तो यह बार-बार का प्रदर्शन कोई नीतिगत लड़ाई नहीं, बल्कि एक नाकाम ‘सौदा’ है। जब-जब कनेक्शन नहीं बैठता, जब-जब बात ‘ऊपर-नीचे’ होती है… तब-तब सड़क पर नाकेबंदी हो जाती है। कथित तौर पर हफ्ता-वसूली के नए-नए पैंतरे आजमाए जा रहे हैं, और जब बात नहीं बनती, तो इसे ‘जनहित का प्रदर्शन’ बता दिया जाता है।
बात जब रेत के इस काले कारोबार की आती है, तो इतिहास गवाह है—राजनीति के इस खेल में हमाम में सब नंगे हैं। जब इनके अपने आकाओं की सरकार थी, तब भी इसी रेत के खेल की शहनाइयां बजती थीं। तब भी घाटों पर यही सब चलता था, क्योंकि कहावत पुरानी है—’जिसकी लाठी, उसकी भैंस!’ तब सत्ता की लाठी पास में थी, तो मलाई खा रहे थे। आज दौर बदला, तो तरीके बदल गए… लेकिन नीयत कितनी बदली? यह सवाल आज हर आम नागरिक पूछ रहा है।
मान लिया कि कारोबार अवैध है, मान लिया कि गाड़ियां ओवरलोड हैं… लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी भी राजनीतिक कार्यकर्ता या आम नागरिक को सड़क पर किसी वाहन को रोकने का कानूनी अधिकार है? कानून इस विषय पर पूरी तरह स्पष्ट है
खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 और राज्य गौण खनिज नियमों के तहत केवल राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित अधिकारी ही खनिज परिवहन करने वाले वाहनों की जांच कर सकते हैं। इसमें जिला खनिज अधिकारी (DMO), खनन निरीक्षक (Mining Inspector), राजस्व अधिकारी (कलेक्टर, SDM, तहसीलदार) और नामित पुलिस अधिकारी शामिल हैं।
गाड़ियों की ओवरलोडिंग, फिटनेस या परमिट जांचने का अधिकार केवल क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी (RTO), परिवहन निरीक्षक और यातायात पुलिस के पास है।
किसी भी गैर-सरकारी व्यक्ति, राजनीतिक कार्यकर्ता या युवाओं के समूह को बीच सड़क पर किसी भी वाहन को रोकने, चालकों को बंधक बनाने, या ‘पीट पास’ एवं दस्तावेज मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
अधिकारियों के अलावा किसी अन्य द्वारा बीच सड़क वाहन रोकना भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत सदोष अवरोध , रंगदारी/वसूली का प्रयास और गैर-कानूनी जमाव की श्रेणी में आता है, जो एक दंडनीय अपराध है।
यदि किसी नागरिक या संगठन को अवैध खनन या परिवहन की आशंका है, तो उसका एकमात्र कानूनी तरीका सक्षम प्राधिकारी (खनन विभाग, पुलिस, या जिला प्रशासन) को लिखित शिकायत/ज्ञापन देना या मौके पर अधिकारियों को बुलाना है।
हद तो तब हो जाती है जब बिना जांचे-परखे… केवल हाइवा का ढांचा देखकर मलबे और मिट्टी से भरी गाड़ियों को भी रोक लिया जाता है। रेत के नाम पर मलबे से भरे वाहनों को रोकना यह साबित करता है कि यह प्रदर्शन किसी अध्ययन या सुधार के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ ‘दहशत और दबाव’ बनाने का पैंतरा है।
और इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा नुकसान किसका हो रहा है? उस मुख्य संगठन और उसके जिला नेतृत्व का। 5 से 7 लड़कों की इस मनमानी और कथित वसूली के खेल ने पूरे दल और उसके वरिष्ठ नेताओं की साख को दांव पर लगा दिया है। जिला नेतृत्व की खामोशी पर भी अब उंगलियां उठ रही हैं कि क्या इन लड़कों को बड़े आकाओं का मौन समर्थन प्राप्त है, या फिर संगठन लाचार हो चुका है?
अवैध खनन के खिलाफ लड़ाई होनी चाहिए, बिल्कुल होनी चाहिए। लेकिन लड़ाई नीयत से होती है, ‘सेटिंग’ न बैठने के गुस्से से नहीं। अगर अवैध रेत परिवहन हो रहा है, तो ज्ञापन दीजिए, प्रशासन पर दबाव बनाइए, अधिकारियों को मौके पर बुलाइए। लेकिन खुद कानून अपने हाथ में लेकर, गाड़ियां रोककर, वसूली का माहौल बनाकर राजनीति करना न तो जायज है और न ही कानूनी!
अब देखना यह होगा कि दल का जिला नेतृत्व ऐसे स्वयंभू कानून-रक्षकों पर लगाम लगाता है, या फिर रेत के इस खेल में संगठन की साख यूं ही नीलाम होती रहेगी!
