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‘सरकारी अस्पताल या प्राइवेट मेडिकल का गेटवे?’

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​मुफ्त इलाज का दावा… लेकिन पर्ची लेकर बाहर भागने को मजबूर मरीज; आखिर कौन सुधारेगा जिला अस्पताल की यह लचर व्यवस्था?

कहते हैं कि ‘सरकारी अस्पताल’ आम आदमी की आखिरी उम्मीद होता है… एक ऐसी जगह जहाँ कोई गरीब या निम्न-मध्यम वर्ग का व्यक्ति अपनी जेब का खालीपन भूलकर इलाज कराने की आस में पहुँचता है। लेकिन क्या आपने कभी जिला अस्पताल की चौखट पर कदम रखते ही एक दिलचस्प नजारा देखा है?

अस्पताल के ठीक बाहर, कतार से सजे-धजे दर्जनों प्राइवेट मेडिकल स्टोर्स! अब सवाल यह उठता है कि अगर मरीज को इलाज भी बाहर ही कराना है और दवाइयां भी इन चमचमाती निजी दुकानों से ही खरीदनी हैं, तो फिर इस विशालकाय ‘जिला अस्पताल’ की इमारत का आखिर औचित्य क्या है? क्या इसे केवल एक ‘ट्रांजिट स्टेशन’ की तरह चलाया जा रहा है, जहाँ मरीज अंदर आता है और पर्ची बाहर की दुकानों तक पहुँच जाती है?

मामला केवल मेडिकल स्टोर्स की मौजूदगी का नहीं है, असली खेल तो अस्पताल के भीतर शुरू होता है। जब कोई मजबूर मरीज घंटो लाइन में लगकर डॉक्टर से सलाह लेता है और उम्मीद से भरा चेहरा लेकर ‘शासकीय मेडिकल काउंटर’ पर पहुँचता है… तो वहाँ उसे एक रटा-रटाया जवाब मिलता है— “यह दो दवाइयां तो अंदर हैं, लेकिन बाकी की तीन दवाएं आपको बाहर से ही लेनी पड़ेंगी।”

अब जरा सोचिए! जब मरीज अस्पताल ही इसलिए आया था क्योंकि उसकी इतनी हैसियत नहीं कि वह बाहर के भारी-भरकम खर्चे उठा सके, तो फिर उसे बाहर का रास्ता क्यों दिखाया जाता है? आखिर ठीक होने की मजबूरी में उस गरीब को अपनी गाढ़ी कमाई इन्हीं प्राइवेट दुकानों में लुटानी ही पड़ती है।

अगर सरकारी तंत्र के पास सभी जरूरी दवाइयां उपलब्ध ही नहीं हैं, तो इन कमियों को दूर करने की जिम्मेदारी किसकी है?

डॉक्टर साहब जब पर्ची पर दवा लिखते हैं, तो वे मरीज की भलाई ही चाहते होंगे… लेकिन क्या अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारियों को यह दिखाई नहीं देता कि उनकी अपनी फार्मेसी रीती पड़ी है?

क्या यह महज एक इत्तेफाक है कि अस्पताल की चहारदीवारी खत्म होते ही निजी दवाखानों का एक पूरा बाजार आबाद हो जाता है?

हम किसी पर कोई उंगली नहीं उठा रहे और न ही किसी की मंशा पर सीधे तौर पर सवाल दाग रहे हैं… लेकिन यह व्यवस्था का वो ढांचा है जो चीख-चीखकर जवाब मांग रहा है। क्या जिम्मेदार प्रशासन इस जमीनी हकीकत का संज्ञान लेकर व्यवस्था सुधारेगा, या फिर गरीब मरीज यूँ ही अंदर की पर्ची लेकर बाहर के चक्कर काटता रहेगा?

जवाब का इंतजार इस शहर के हर उस नागरिक को है, जो ‘मुफ्त इलाज’ का हक लेकर इन सरकारी दरवाजों पर दस्तक देता है।

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