करोड़ों की स्वीकृति का ढोल पीटने वाले महापौर और सभापतियों की अब खुली आँख; क्या अब लौट आएगी वो नाबालिग बेटी?

धमतरी/सुभाष नगर स्थित पानी टंकी परिसर में एक मासूम नाबालिग युवती की जान जाने के बाद अब नगर निगम प्रशासन अपनी ‘साख’ बचाने की कवायद में जुट गया है। जब हादसा हो गया और एक हंसता-खेलता परिवार उजड़ गया, तब जाकर महापौर जगदीश रामू रोहरा, जल विभाग के सभापति अखिलेश सोनकर और पार्षद श्रीमती हिमानी भगवत साहू को सुरक्षा व्यवस्था और गेट की मजबूती की याद आई है।
क्या इन कागजी निर्देशों से मिलेगा पीड़ित परिवार को न्याय?
आज नगर निगम के जिम्मेदार पदाधिकारी मौके का मुआयना कर ‘विशेष निगरानी’ और ‘मजबूत गेट’ के निर्देश दे रहे हैं, लेकिन शहर की जनता पूछ रही है कि क्या इन निर्देशों से उस मृत युवती के परिवार को उनका बच्चा वापस मिल जाएगा? जो प्रशासन विकास के नाम पर करोड़ों रुपये की स्वीकृति के बड़े-बड़े दावे करता है, क्या उसके पास एक पानी टंकी की घेराबंदी करने और वहां एक गार्ड तैनात करने के लिए बजट नहीं था?
लापरवाही की इंतहा: क्यों नहीं की गई पहले घेराबंदी?
सवाल यह उठता है कि अगर नगर निगम ने पहले ही शहर की सभी पानी टंकियों को सुरक्षा के मद्देनजर चाक-चौबंद किया होता, तो वह नाबालिग युवती उस पर चढ़ ही क्यों पाती? यह सीधे तौर पर प्रशासनिक विफलता है।
* क्या टंकियों के गेट खुले छोड़ना नगर निगम की लापरवाही नहीं है?
* क्या करोड़ों के विकास कार्यों का दावा करने वाले महापौर को टंकियों की जर्जर सुरक्षा दीवारें कभी नजर नहीं आईं?
* क्या इस मौत का जिम्मेदार ‘कुछ हद तक’ नहीं, बल्कि ‘पूरी तरह’ नगर निगम का लचर तंत्र नहीं है?
हादसे का इंतजार करता है प्रशासन?
धमतरी नगर निगम की यह कार्यप्रणाली दर्शाती है कि यहाँ व्यवस्थाएं सुधारने के लिए किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जाता है। अब जब एक मासूम की बलि चढ़ गई, तो निगम अपनी छवि सुधारने के लिए निर्देशों की झड़ी लगा रहा है। नागरिकों का कहना है कि यह “नियमित निगरानी” की बात पहले क्यों नहीं की गई? क्या प्रशासन की यह जागृति केवल जनता के आक्रोश को शांत करने का एक तरीका मात्र है?
-कड़वा सवाल: यदि शहर की सुरक्षा के लिए करोड़ों का बजट स्वीकृत है, तो मासूमों के लिए ये टंकियां ‘डेथ ट्रैप’ क्यों बनी हुई हैं? क्या जिम्मेदार अधिकारी अपनी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे?
